मुरारबाजी देशपांडे

जो पुरंदर किल्ले के रक्षक थे, और छत्रपति शिवाजी महाराज के मावले।
मुरारबाजी देशपांडे।

<center>मुरारबाजी देशपांडे</center>
Murarbaji Deshapande

पुरंदर किल्ले के लढाई में पुरंदर किल्ले के रक्षक यानि किल्लेदार मुरारबाजी देशपांडे, इनका जन्म कब हुआ यह किसीको भी पता नही है, लेकिन उनका जन्म स्थान यानी मूल गाँव किंजळोली है। यह गांव महाड तालुका में है। शुरू में मुरारबाजी जावली के चंद्रराव मौर्या के लिए काम करते थे।

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छत्रपति शिवाजी महाराज ने जावली पर जब हमला किया तब, वे मुरारबाजी के पराक्रम से आकर्षित हुए। उन्होंने अपने बातों से मुरारबाजी के मन को जीत लिया। और तब से मुरारबाजी महाराज और स्वराज के खातिर अपने प्राणों की बाजी लगाते रहे।

पुरंदर किल्ले के पराक्रम में उनकी बहादुरी सबसे बड़ी थी। पुरंदर के लड़ाई के दौरान खुद दिलेरखान ने उन्हें जहांगीरी का लालच दिखाया, पर उन्होंने वह नही माना। इतिहास की सबसे प्रसिद्ध घटनाओं में से एक हैं, आखरी सांस तक मुरारबाजी देशपांडे द्वारा दिलेरखान से लढ़ी गई लड़ाई। तो चलिए आज हम पुरंदर के इसी युद्ध के बारे में जानते है। पर उससे पहले हम जानेंगे पुरंदर किल्ले के बारे में। क्युकी इसके बिना उस लड़ाई को समजना कठिन होगा।

पुरंदर किल्ला
Purandar Fort

पुरंदर किल्ला, शिवाजी महाराज ने १६४६ को पुरंदर किल्ले को जिता, इसी किल्ले के जीत के साथ मराठा साम्राज्य कि नीव रखी गई। और छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन की शुरुआत हुई। यह प्रसिद्ध किला पश्चिम घाटी में स्थित है और समुद्र से 4472 फीट की उचाई पर है। पुरंदर किल्ले के ठीक सामने है वज्रगढ़। जो पुरंदर जैसा ही मजबूत है। पुरंदर किल्ला २ हिस्सों में बटा हुआ है। एक है पुरंदर की माची और दूसरा बाले किल्ला। किल्ले के दरवाजे से ऊपर आते ही माची है, और किल्ले के ऊपर पहाड़ पर चढ़ कर पुरंदर के बाले किल्ले का दरवाजा है, जहा जाने के लिए सिर्फ एक ही रास्ता है। अगर शत्रु को आना भी हो तो उसे इसी रास्ते से आना होगा। और वह नहीं आ सकता था, क्युकी उससे पहले उसे वज्रगढ़ का सामना करना पड़ता। और फिर माची के तोफों के वार का।

हम जानेंगे उस ऐतेहासिक युद्ध के बारे में, जिसके कारण मुरारबाजी ने अपने प्राण तक स्वराज के लिए त्याग दीए। वो दिन था १६ मई १६६५ आषाढ़ माह का। मिर्ज़ाराजे जयसिंग स्वराज पर आक्रमण करने आया। उसने दिलेरखान को पुरंदर पर आक्रमण करने के लिए २५ से ३०००० फ़ौज के साथ भेज दिया। उस समय मुरारबाजी बाले किल्ले पर मौजूद थे। दिलेरखान ने पुरंदर को घेर लिया। पर रातदिन कोशिश करने के बावजूद वह किल्ले को जीत नही सका, उसे यह समज आया की, पुरंदर की मजबूती को तोड़ने के लिए वज्रगड पहले जितना होगा।

इसलिए उसने वज्रगड पर तोफ़ ऊँचाई पर चढ़ाई। ताकि तोफो का निशाना वज्रगड पर ठीक से लगाया जा सके। उस समय वज्रगड पर केवल 300 मावले मौजूद थे। उन 300 मावलों ने 15 दिनों तक किल्ले को संभाला। लेकिन तोफो के हमले के कारण वज्रगड किल्ले की दीवारें टूटीं और दिलेरखान ने किल्ले पर कब्जा किया। लेकिन मुरारबाजी ने पुरंदर किल्ले पर हार नही मानी। उन्होंने आक्रमण की तैयारियां की। मावलों को होशियार रहने के लिए कहा। और यहाँ दिलेरखान ने वज्रगड से पुरंदर के माची पर हमला किया। दिलेरखान के दूरतक निशानेवाले तोफो के सामने पुरंदर की माची टिक नही पाई और उस माची को भी दिलेरखान ने जीत लिया।

वज्रगड
Vajrgad

वज्रगड और फिर पुरंदर के माची के बाद उसने पुरंदर किल्ले पर हमला किया। यह सबसे बड़ा झटका था मुरारबाजी के लिए। पुरंदर पर तब केवल 1000 मावालें थे। उन सबके सरदार यानी पुरंदर की सुरक्षा करनेवाले मुरारबाजी देशपांडे थे। उन्होंने दिलेरखान को हराने के लिये एक विचार किया। सामने से वार करने के लिए उन्होंने गड के द्वार खोलकर लड़ाई करने की ठान ली। इसलिए उन्होंने हमले के लिए किल्ले में मौजूद 1000 मावलों में से 700 मावलों को चुना चुना। इस विचार के पीछे का एक कारण भी था। एक साल पहले, सिंहगड के चारों ओर घेरा डालनेवाले मुग़ल राजपूत जसवंत सिंह और मुग़ल फौज पर कुछ ही चुनिंदा मावलों के साथ ऐसाही हमला किया था। और इसमें उन्हें सफलता भी मिली थी। हारे हुए जसवंत सिंह और मुग़ल फौज तब उनके डर से भाग गई थी। यह बात सोचकर ही उन्होंने इस बार भी उसी रणनीति से आक्रमण करने का सोचा। वेसे भी पुरंदर किसी भी वक्त मुग़लों के कब्जे में जा सकता था, और अगर प्रयास सफल हो जाता तो पुरंदर किल्ले का इतिहास बन जाता।

२५००० से ३०००० मुग़ल फ़ौज के सामने सिर्फ ७०० मावलें। इतनी बड़ी फ़ौज के खिलाफ सिर्फ ७०० मावलें और वह भी सिर्फ तलवारें लेकर।

दिलेरखान पुरंदर के माची पर पहुँचा। उसने सुल्तानढवा चाल से किल्ले पर आक्रमण करने का सोचा। और मुरारबाजी ने उसी वक्त दिलेरखान की ओर सीधे आक्रमण किया। मुरारबाजी और मावलें तो जैसे दिलेरखान और उसकी फ़ौज और पठानों पर टुंट पड़े थे। शौर्य की इस अग्नि को देख खान भी घबरा गया। दिलेरखान ने खुद ही मुरारबाजी पर होनेवाले हमले को आदेश देकर हटाया। हमला रोक दिया। खान के सामने ही मुरारबाजी लढ़ रहे थे। सारे रुक गए। और दिलेरखान ने कहा,”बहददुर, तुम्हारी बहादुरी देखकर में निहायत खुश हुआ हूं। तुम हमारे साथ चलो। हम तुम्हारी शान रखेंगे।” ऐसी बातें सुनकर मुरारबाजी और भी भड़क उठे। यह खान मुझे फितूरी सिखा रहा है। इस बात से उन्हें गुस्सा आया।

मुरारबाजी ने उसे गुस्से से जवाब दिया। “मी शिवाजी महाराजांचा मावळा आहे. तुझा कौल घेतो की काय?” और दिलेरखान की ओर मुरारबाजी टुट पड़े। और फिर युद्ध शुरू हुआ। यह देख की मुरारबाजी अपनी ओर युद्ध करने आ रहे है, दिलेरखान ने उनपर धनुष तान दिया। दिलेरखान ने धनुष की डोर अपने कानों तक खिंची। मुरारबाजी के तलवार चला रहे हाथों पर तीर चलाया। और मुरारबाजी की मौत हो गई।

एक प्रखर तेज जैसे सूरज के तेज के साथ ढल गया।

मुरारबाजी के शरीर को कुछ मावलें गढ़ पर लेकर गए। मुरारबाजी दिलेरखान और उसकी फ़ौज के साथ लड़े और फिर युद्ध में ही मौत के गोद में समा गए। दिलेरखान के पठानों ने जो सुल्तानढवा चाल चली, उसे पूरा न होने दिया। लेकिन मुरारबाजी के मृत्यु के बाद भी मावलों ने हार नहीं मानी। उनकी इस जज्बे को देख दिलेरखान खुद बोला की, “यह केसा सिपाही पैदा किया खुदा ने!” पर मावलों ने हार न मानते हुए दिलेरखान को किल्ला जितने नहीं दिया।

मुरारबाजी देशपांडे
Murarbaji Deshapande

किल्ले का द्वार टुंट गया पर मावलों ने किल्ले को टुंटने नहीं दिया। जैसे की, एक मुरारबाजी नहीं रहे तो क्या हुआ, यहाँ उनके जैसे और कई मुरारबाजी है। उनके जैसा स्वराज्यप्रेम मावलों के मन में भड़क उठा था। २ महीनों तक मुरारबाजी और मावलों ने दिलेरखान को रोख रखा, और उसे किल्ला जितने नहीं दिया।

मिर्झाराजे जयसिंग और दिलेरखान के रूप में स्वराज पर आया हुआ संकट दूर करने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने ११ जून १६६५ को मिर्झाराजे के साथ एक करार किया, जिसके मुताबिक छत्रपति शिवाजी महाराज को २३ किल्ले और ४ लाख स्वर्ण मुद्राये मिर्झाराजे को देनी थी। करार कर महाराज ने स्वराज पर आया हुआ संकट दूर किया। और कुछ दिनों में फिर से पुरंदर किल्ला जित लिया। पर मुरारबाजी जैसे वीर योद्धा को खो दिया।

धन्य है ऐसे स्वराज के वीर, जिनके कारन स्वराज है।

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